मंगलवार, 29 नवंबर 2022

ॐ का अर्थ

 ॐ का अर्थ


भगवान् आशुतोष (शिव शंकर) को देवताओं के सेनापति कार्तिकेय ने ॐ का अर्थ कुछ इस तरह बताया था, निम्नलिखित पर ध्यान दें....

ॐ एक अक्षर है, एक शब्द है, यह ध्वनि या नाद भी है । ॐ में तीन ध्वनियाँ हैं जिन्हें मात्रा कहा जाता है, वे है “अ”, “उ” और “म” । जब “अ” और “उ” मिल जाते हैं तो “ओ” बनता है और जब इस “ओ” से “म” जुड़ जाता है तब ॐ बनता है । किसी भी व्यक्ति की, चाहे उसकी मात्रभाषा कोई भी क्यों ना हो जब वो उच्चारण के लिए मुह खोलता है तो स्वाभाविक “अ”-कार की ध्वनि निकलती है और जब वो उच्चारण के अनंतर मुह बंद करता है तब केवल “म”-कार की ध्वनि सुनाई पड़ती है और जब वो होठों को पास लाकर मुह को आधा खुला और आधा बंद रखता है तब “उ”-कार की सर्गिक ध्वनि सुनाई पड़ती है यानी जब मुह खोलते हैं तो “अ”, मुह बंद करते हैं तो “म” और दोनों के बीच “उ” की ध्वनि सुनाई देती है । इसलिए साड़ी भाषाओँ की साड़ी ध्वनियाँ चाहे वे स्वर हो या व्यंजन, वे सब ओंकार के अंतर्गत ही आती हैं । इसलिए ॐ विशिष्ट वैश्विक ध्वनि है । 

ॐ ईश्वर का प्रतीक भी है । माण्डुक्य-उपनिषद् के अनुसार जागृत अवस्था का समग्र जागृत प्रपंच ओंकार की प्रथम मात्रा “अ” से अभिव्यक्त होता है, समस्त स्वप्नावस्था का प्रपंच “उ” मात्रा से अभिव्यक्त होता है और सुषुप्ति अवस्था का प्रपंच “म” से अभिव्यक्त होता है । सम्पूर्ण प्रपंच ही ईश्वर है और जागृत, स्वप्न, और सुषुप्ति ही समस्त प्रपंच है । और इन तीनों का प्रतीक “अ”, “उ”, “म” है इसलिए ॐ ही ईश्वर का अतिअद्भुत प्रतीक है । 

ओंकार ईश्वर के निर्गुण रूप का प्रतीक भी है । माण्डुक्य-उपनिषद् का घोष है जैसे तीनों अवस्थाएं ब्रह्म या आत्मा से ही उत्पन्न होती हैं और उसी में विलीन हो जाती हैं वैसे ही तीन मात्राओं से बना ॐ (ओउम्) शान्ति या निशब्दता से उत्पन्न होता है और उसी में विलीन हो जाता है । इसलिए दो ओंकार के उच्चारणों के अंतराल के बीच की निशब्दता जिसे अमात्रा कहते हैं निर्गुण ब्रह्म का ही प्रतीक है । जिस प्रकार ओंकार के उच्चारण के समय “अ” मात्रा “उ” मात्रा में, “उ” मात्रा “म” मात्रा में और “म” मात्रा निशब्दता में विलीन हो जाती है, उसी प्रकार उपासना के समय इसी ॐ के उच्चारण को आधार ले साधक स्थूल जागृत प्रपंच को  सूक्ष्म या मानसिक प्रपंच में, और सूक्ष्म प्रपंच को कारण प्रपंच में विलीन करता है । आगे उसका भी अतिक्रमण कर वह केवल शांत निर्गुण शान्तं शिवम् अद्वैतं आत्मा में ही स्थिर हो जाता है । यही ओंकार उपासना की चरम सीमा है ।


ॐ का दार्शनिक अर्थ : ॐ वो सब अभिव्यक्त करता है जो कुछ अस्तित्व में है और जो समूचे अस्तित्व का मूल है और जो सबसे परे है वह भी । ॐ को प्रणव भी कहते हैं यानी वह जिसके द्वारा ईश्वर की स्तुति की जाती है ।  




प्रश्न: मन्त्रों और प्रार्थनाओ में ॐ क्यों कहा जाता है जैसे ॐ नमः शिवाय, ॐ नमो नारायणाय, ॐ नमो भगवते वासुदेवाय इत्यादि ?

उत्तर: ऐसा कहा जाता है कि ईश्वर ने संसार की रचना ॐ और अथ का उच्चारण के पश्चात आरम्भ की थी । इसलिए ऐसी मान्यता है कि किसी भी कठिन कार्य को आरम्भ करने से पहले ॐ के उच्चारण की ध्वनि शुभ होती है । इसलिए बहुत से मन्त्र और वैदिक प्रार्थनाएं ॐ से ही आरम्भ होती हैं । इतना ही नहीं, दैनिक जीवन में अभिवादन के लिए भी ॐ का प्रयोग किया जाता है जैसे “हरि ॐ” तो इस प्रकार ॐ सब कुछ व्यक्त करता है ।

🌹 ज्योतिषाचार्य डॉ: शैलेन्द्र  सिंगला पलवल हरियाणा

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