शनिवार, 30 जून 2018

ऐ इंसान अब बस करो इंसानियत के रास्ते बंद मत करो।

Filled under:

ऐ इंसान अब बस करो इंसानियत के रास्ते बंद मत करो ।
ये मन कचोटता सा हैं जैसे दिल पर कोई चाकू खरोचता है ।
कभी छोटी तो कभी बड़ी कभी अपने तो कभी पराये ।
इन पर सब क्यों है गंदी नज़र गड़ाए।
न्याय की भीड़ मे जो खड़े दिन में होते है
रात के अंधेरे में वही असली दरिंदे होते है 
क्या छोटी की बच्ची के साथ तुम्हे खेलना अच्छा लगता है
उनके सपनो को यो कुचलना तुम्हे अच्छा लगता है
तुम शैतान हो असल मे तुम लगते नही
लेकिन तुम इंसान हो ऐसे भी तुम लगते नही।
बचपन मे तुम कौन सा खेल खेलते थे तुम्हे याद है
तुम्हारी माँ ने कौन सा सबक   सिखाया तुम्हे याद है।
माँ के दूध न पिता की परवरिश की तुम्हे चिंता थी
तुम्हे तो बस इन मासूमो के सपनो की चिता जलानी थी।
ऐ इंसान अब बस करो इंसानियत के रास्ते बंद मत करो।

Posted By PT ASHISH TRIPATHIजून 30, 2018

मनहूस यांदे

Filled under:


Posted By PT ASHISH TRIPATHIजून 30, 2018

आज का राशिफल (1 जुलाई 2018)

पंडित आशीष त्रिपाठी आज का राशिफल
मेष (Aries)
जीवनसाथी के स्वास्‍थ्य की चिंता रहेगी। नए कार्यकारी अनुबंध हो सकते हैं। प्रतिष्ठा बढ़ेगी। धनार्जन होगा।
वृष (Taurus)
शत्रु सक्रिय रहेंगे। वरिष्ठजन सहयोग करेंगे। तीर्थयात्रा हो सकती है। सत्संग का लाभ मिलेगा। प्रमाद न करें।
मिथुन (Gemini)
कुसंगति से हानि होगी। पुराना रोग उभर सकता है। वाहन व मशीनरी के प्रयोग में सावधानी आवश्यक है।
कर्क (Cancer)
विवाद न करें। प्रेम-प्रसंग में अनुकूलता रहेगी। बाहरी सहयोग से कार्य बनेंगे। कीमती वस्तुएं संभालकर रखें।
सिंह (Leo)
शत्रु नतमस्तक होंगे। ऐश्वर्य पर खर्च होगा। भूमि व भवन संबंधी बाधा दूर होकर उन्नति होगी। तीर्थयात्रा हो सकती है।
कन्या (Virgo)
बेचैनी रहेगी। रचनात्मक कार्य सफल रहेंगे। पार्टी व पिकनिक का आनंद मिलेगा। प्रसन्नता रहेगी।
तुला (Libra)
भागदौड़ अधिक रहेगी। शोक समाचार मिल सकता है। वाणी पर नियंत्रण रखें। पुराना रोग उभर सकता है।
वृश्चिक (Scorpio)
सुख के साधन जुटेंगे। यात्रा मनोरंजक रहेगी। मान-सम्मान मिलेगा। चिंता तथा तनाव रहेंगे। धनार्जन होगा।
धनु (Sagittarius)
पुराने मित्र व संबंधियों से मुलाकात होगी। उत्साहवर्धक सूचना मिलेगी। आत्मसम्मान में वृद्धि होगी।
मकर (Capricorn)
कष्ट व भय का वातावरण बनेगा। यात्रा मनोरंजक होगी। भेंट व उपहार की प्राप्ति होगी। आय में वृद्धि होगी।
कुंभ (Aquarius)
अप्रत्याशित खर्च होंगे। कर्ज लेना पड़ सकता है। जोखिम व जमानत‍ के कार्य टालें। विवाद न करें।
मीन (Pisces)
बकाया वसूली के प्रयास सफल रहेंगे। यात्रा मनोरंजक होगी। लाभ के अवसर बढ़ेंगे। प्रमाद न करें।

Posted By PT ASHISH TRIPATHIजून 30, 2018

आइये अपनी लग्न कुंडली से जाने अपने ईष्ट देव को….

आइये अपनी लग्न कुंडली से जाने अपने ईष्ट देव को….

भारतीय धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ईश्वरीय शक्ति की उपासना अलग-अलग रूपों में की जाती है। हिन्दू धर्म में तैंतीस करोड़ देवताओं को उपास्य देव माना गया है व विभिन्न शक्तियों के रूप में उनकी पूजा की जाती है।
आजकल परेशानियों, कठिनाइयों के चलते हम ग्रह शांति के उपायों के रूप में कई देवी-देवताओं की आराधना, मंत्र जाप एक साथ करते जाते हैं। परिणाम यह होता है कि किसी भी देवता को प्रसन्न नहीं कर पाते- जैसा कि कहा गया है – ‘एकै साधै सब सधै, सब साधै सब जाय’ जन्मकुंडली के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति के इष्ट देवी या देवता निश्चित होते हैं।
यदि उन्हें जान लिया जाए तो कितने भी प्रतिकूल ग्रह हो, आसानी से उनके दुष्प्रभावों से रक्षा की जा सकती है।हम सब प्रतिदिन विभिन्न देवी -देवताओं का पूजन करते हैं। लगभग सभी सकाम पूजा ही करते हैं। कहने का मतलब यह है कि हम हमारी मनोकामना पूर्ण करने के लिए ही ईश्वर को मानते है। बहुत कम लोग होते हैं निष्काम पूजा करते हैं। बहुत सारे लोगों कि यह शिकायत होती है कि वो पूजा -व्रत आदि बहुत करते हैं फिर भी फल नहीं मिलता। 
मैं यहाँ कहना चाहूंग कि हमें काम तो बिजली विभाग में होता है और चले जाते हैं जल-विभाग में ! जब हम गलत कार्यालय में जायेंगे तो काम कैसे होगा। इसी प्रकार हर कुंडली के अनुसार उसके अपने अनुकूल देवता होते हैं।
लग्नानुसार इष्ट देव——
लग्न स्वामी ग्रह इष्ट देव
मेष, वृश्चिक मंगल हनुमान जी, राम जी
वृषभ, तुला शुक्र दुर्गा जी
मिथुन, कन्याबुध गणेश जी, विष्णु
कर्क चंद्र शिव जी
सिंह सूर्य गायत्री, हनुमान जी
धनु/ मीन गुरु विष्णु जी (सभी रूप), लक्ष्मी जी
मकर, कुंभ शनि हनुमान जी, शिव जी
लग्न के अतिरिक्त पंचम व नवम भाव के स्वामी ग्रहों के अनुसार देवी-देवताओं का ध्यान पूजन भी सुख-सौहार्द्र बढ़ाने वाला होता है। इष्ट देव की पूजा करने के साथ रोज एक या दो माला मंत्र जाप करना चमत्कारिक फल दे सकता है और आपकी संकटों से रक्षा कर सकता है।
विशेष : इष्ट का ध्यान-जप का समय निश्चित होना चाहिए अर्थात यदि आप सुबह सात बजे जप ध्यान करते हैं, तो रोज उसी समय ध्यान करें। अपनी सुविधानुसार समय न बदलें।
व्यक्ति यदि अपने लग्र के देवता की पूजा करें तो उनको अपने हर काम में सफलता मिलने लगेगी।
देव मंत्र —-
हनुमान—- ऊँ हं हनुमंताय नम:
शिव—- ऊँ रुद्राय नम:
गणेश —ऊँ गंगणपतयै नम:
दुर्गा— ऊँ दुं दुर्गाय नम:
राम —-ऊँ रां रामाय नम:
विष्णु— विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ
लक्ष्मी— लक्ष्मी चालीसा,…ऊँ श्रीं श्रीयै नम:
किसी भी कुंडली के लग्न /प्रथम भाव , पंचम भाव और नवम भाव में स्थित राशि के अनुसार इष्ट देव निर्धारित होते है और इनके अनुसार ही रत्न धारण किये जा सकते हैं।
मेष लग्न :– जन्म कुंडली के प्रथम भाव में अगर प्रथम राशि मेष होती है तो वह मेष लग्न की कुंडली कही जायेगी। मेष लग्न में पांचवे भाव में सिंह राशि और नवम भाव में धनु राशि होती है।
मेष राशि का स्वामी मंगल , सिंह राशि का स्वामी है सूर्य और धनु राशि का स्वामी वृहस्पति है। इस कुंडली के लिए अनुकूल देव हनुमान जी , सूर्य देव और विष्णु भगवान है ।
मेष लग्न के लिए हनुमान जी की आराधना , मंगल के व्रत , सूर्य चालीसा , आदित्य – हृदय स्त्रोत , राम रक्षा स्त्रोत , रविवार का व्रत , वृहस्पति वार का व्रत , विष्णु पूजन करना चाहिए। मूंगा , माणिक्य और पुखराज रत्न अनुकूल रहेंगे।
वृषभ लग्न :– जन्म कुंडली के प्रथम भाव में अगर द्वितीय राशि वृषभ होती है तो वह वृषभ लग्न की कुंडली कही जायेगी। वृषभ लग्न में पांचवे भाव में कन्या राशि और नवम भाव में मकर राशि होती है।
वृषभ राशि का स्वामी शुक्र , कन्या राशि का बुध और मकर राशि के स्वामी शनि देव है।
वृषभ लग्न वालों के लिए लक्ष्मी देवी , गणेश जी और दुर्गा देवी की आराधना उचित रहेगी। लक्ष्मी चालीसा , दुर्गा चालीसा और गणेश चालीसा का पाठ करना चाहिए।
मिथुन लग्न :– जन्म कुंडली के प्रथम भाव में अगर तृतीय राशि मिथुन होती है तो वह मिथुन लग्न की कुंडली कही जायेगी। मिथुन लग्न में पांचवे भाव में तुला राशि और नवम भाव में कुम्भ राशि होती है।
मिथुन राशि का स्वामी बुध , तुला राशि का शुक्र और कुंभ राशि का स्वामी शनि देव हैं।
इस लग्न के लिए गणेश जी , लक्ष्मी देवी और काली माता अराध्य होगी। कुम्भ राशि के स्वामी शनि होने के कारण शनि देव को प्रसन्न और शांत रखने के उपाय किये जा सकते हैं।
इस लग्न के लिए पन्ना , हीरा और नीलम अनुकूल रत्न हैं।
कर्क लग्न :– जन्म कुंडली के प्रथम भाव में अगर चतुर्थ राशि कर्क होती है तो वह कर्क लग्न की कुंडली कही जायेगी। कर्क लग्न के पांचवे भाव में वृश्चिक राशि और नवम भाव में मीन राशि होती है।
कर्क राशि के स्वामी चंद्रमा,वृश्चिक राशि के स्वामी मंगल और मीन राशि के स्वामी वृहस्पति होते है। इस लग्न के लिए शिव जी , हनुमान जी और विष्णु जी अराध्य देव होंगे।
इस लग्न के लिए मोती , मूंगा और पुखराज अनुकूल रत्न हैं।
सिंह लग्न :– जन्म कुंडली के प्रथम भाव में अगर पंचम राशि सिंह होती है तो वह सिंह लग्न की कुंडली कही जायेगी। सिंह लग्न के पांचवे भाव में धनु राशि और नवम भाव में मेष राशि होती है।
सिंह राशि का स्वामी सूर्य देव , धनु राशि के स्वामी वृहस्पति और मेष राशि के स्वामी मंगल होता है।
इस लग्न के लिए सूर्य देव , विष्णु जी और हनुमान जी आराध्य देव होंगे।
इस लग्न के लिए माणिक्य , मूंगा और पुखराज रत्न अनुकूल होते हैं।
कन्या लग्न :– जन्म कुंडली के प्रथम भाव में अगर षष्ठ राशि कन्या होती है तो वह कन्या लग्न की कुंडली कही जायेगी। इस लग्न के पांचवे भाव में मकर राशि और नवम भान में वृषभ राशि होती है।
कन्या राशि का स्वामी बुध , मकर राशि का स्वामी शनि और वृषभ राशि का स्वामी शुक्र होता है।
इस लग्न के लिए गणेश जी , दुर्गा देवी ,लक्ष्मी देवी आराध्य देव होते हैं और पन्ना, नीलम और हीरा अनुकूल रत्न होते हैं।
तुला लग्न :– जन्म कुंडली के प्रथम भाव में अगर सप्तम राशि तुला हो तो वह तुला लग्न की कुंडली कही जायेगी। तुला लग्न में पांचवे भाव में कुम्भ राशि और नवम भाव में मिथुन राशि होती है। तुला राशि का स्वामी शुक्र , कुम्भ राशि का स्वामी शनि और मिथुन राशि का स्वामी बुध होता है। इस लग्न के लिए लक्ष्मी देवी , काली देवी , दुर्गा देवी और गणेश जी आराध्य देव हैं और हीरा , नीलम और पन्ना अनुकूल रत्न है।
वृश्चिक लग्न :– जन्म कुंडली के प्रथम भाव में अगर अष्ठम राशि वृश्चिक हो तो वह वृश्चिक लग्न की कुंडली कही जायेगी। वृश्चिक लग्न में पांचवे भाव में मीन राशि और नवम भाव में कर्क राशि होती है। वृश्चिक राशि का स्वामी मंगल , मीन राशि का स्वामी वृहस्पति और कर्क राशि का स्वामी चन्द्रमा होता है। इस लग्न के लिए हनुमान जी , विष्णु जी और शिव जी अराध्य देव होते है और मूंगा , पुखराज और मोती अनुकूल रत्न है।
धनु लग्न :– जन्म कुंडली के प्रथम भाव में अगर नवम राशि धनु हो तो वह धनुलग्न की कुंडली कही जायेगी। धनु लग्न में पांचवे भाव में मेष राशि और नवम भाव में सिंह राशि होती है। धनु राशि का स्वामी वृहस्पति , मेष राशि का स्वामी मंगल और सिंह राशि का स्वामी सूर्य होता है। इस लग्न के लिए विष्णु जी ,हनुमान जी और सूर्य देव आराध्य देव हैं और पुखराज , मूंगा और माणिक्य अनुकूल रत्न है।
मकर लग्न :– जन्म कुंडली के प्रथम भाव में अगर दशम राशि मकर हो तो वह मकर लग्न की कुंडली कही जायेगी। मकर लग्न में पांचवे भाव में वृषभ राशि और नवम भाव में कन्या राशि होती है। मकर राशि का स्वामी शनि , वृषभ राशि का स्वामी शुक्र और कन्या राशि का स्वामी बुध होता है। इस लग्न के लिए शनि देव , हनुमान जी , दुर्गा देवी , लक्ष्मी देवी और गणेश जी आराध्य देव है और नीलम , हीरा और पन्ना अनुकूल रत्न है।
कुम्भ लग्न :– जन्म कुंडली के प्रथम भाव में अगर एकादश राशि कुम्भ हो तो वह कुम्भ लग्न की कुंडली कही जायेगी। कुम्भ लग्न में पांचवे भाव में मिथुन राशि और नवम भाव में तुला राशि होती है।कुम्भ राशि का स्वामी शनि , मिथुन राशि का स्वामी बुध और तुला राशि का स्वामी शुक्र होता है। इस लगन के लिए शनि देव , काली देवी , गणेश जी , दुर्गा देवी और लक्ष्मी देवी आराध्य देव है और नीलम , पन्ना और हीरा अनुकूल रत्न है।
मीन लग्न :– जन्म कुंडली के प्रथम भाव में अगर द्वादश राशि मीन हो तो वह मीन लग्न की कुंडली कही जायेगी। मीन लग्न में पांचवे भाव में कर्क राशि और नवम भाव में वृश्चिक राशि होती है। मीन राशि का स्वामी वृहस्पति , कर्क राशि का स्वामी चन्द्र और वृश्चिक राशि का स्वामी मंगल होता है। इस लग्न के लिए विष्णु जी , शिव जी और हनुमान जी आराध्य देव है और पुखराज , मोती और मूंगा अनुकूल रत्न है।
=========================================================
शास्त्रों की मान्यतानुसार अपने इष्ट देव की आराधना करने से मनोवांछित फल प्राप्त होते हैं। आपके आराघ्य इष्ट देव कौन से होंगे इसे आप अपनी जन्म तारीख, जन्मदिन, बोलते नाम की राशि या अपनी जन्म कुंडली की लग्न राशि के अनुसार जान सकते हैं।
जन्म माह :—
जिन्हें केवल जन्म का माह ज्ञात है, उनके लिए इष्ट देव इस प्रकार होंगे-
-जिनका जन्म जनवरी या नवंबर माह में हुआ हो वे शिव या गणेश की पूजा करें।
-फरवरी में जन्मे शिव की उपासना करें।
-मार्च , अगस्त व दिसंबर में जन्मे व्यक्ति विष्णु की साधना करें।
-अप्रेल, सितंबर, अक्टूबर में जन्मे व्यक्ति गणेशजी की पूजा करें।
-मई व जून माह में जन्मे व्यक्ति मां भगवती की पूजा करें।
-जुलाई माह में जन्मे व्यक्ति विष्णु व गणेश का घ्यान करें।
जन्म वार से :—-
जिनको वार का पता हो, परंतु समय का पता न हो, तो वार के अनुसार इष्ट देव इस प्रकार होंगे-
रविवार- विष्णु।
सोमवार- शिवजी।
मंगलवार- हनुमानजी
बुधवार- गणेशजी।
गुरूवार- शिवजी
शुक्रवार- देवी।
शनिवार- भैरवजी।
=========================================
जन्म कुंडली से :—-
जिनको जन्म समय ज्ञात हो उनके लिए जन्म कुंडली के पंचम स्थान से पूर्व जन्म के संचित कर्म, ज्ञान, बुद्धि, शिक्षा, धर्म व इष्ट का बोध होता है। अरूण संहिता के अनुसार व्यक्ति के पूर्व जन्म में किए गए कर्म के आधार पर ग्रह या देवता भाव विशेष में स्थित होकर अपना शुभाशुभ फल देते हैं।
राशि के आधार पर :—–
पंचम स्थान में स्थित राशि के आधार पर आपके इष्ट देव इस प्रकार होंगे—–
मेष: सूर्य या विष्णुजी की आराधना करें।
वृष: गणेशजी।
मिथुन: सरस्वती, तारा, लक्ष्मी।
कर्क: हनुमानजी।
सिंह: शिवजी।
कन्या: भैरव, हनुमानजी, काली।
तुला: भैरव, हनुमानजी, काली।
वृश्चिक: शिवजी।
धनु: हनुमानजी।
मकर: सरस्वती, तारा, लक्ष्मी।
कुंभ: गणेशजी।
मीन: दुर्गा, राधा, सीता या कोई देवी।
==============================================
ग्रह के आधार पर इष्ट: पंचम स्थान में स्थित ग्रहों या ग्रह की दृष्टि के आधार पर जानिए आपके इष्ट देव—
सूर्य: विष्णु।
चंद्रमा- राधा, पार्वती, शिव, दुर्गा।
मंगल- हनुमानजी, कार्तिकेय।
बुध- गणेश, विष्णु।
गुरू- शिव।
शुक्र- लक्ष्मी, तारा, सरस्वती।
शनि- भैरव, काली।
==========================================================
इष्ट देव की उपासना—–
नीचे सभी राशियों के देवता दिए जा रहे हैं। अपनी राशि के अनुसार देवता की आराधना करे—–
मेष : हनुमान जी
वृषभ : दुर्गा माँ
मिथुन : गणपति जी
कर्क: शिव जी
सिंह : विष्णु जी (श्रीराम )
कन्या : गणेश जी
तुला : देवी माँ
वृश्चिक : हनुमान जी
धनु : विष्णु जी
मकर : शिव जी
कुम्भ : शिव का रूद्र रूप
मीन : विष्णु जी (सत्यनारायण भगवान)
==========================================
प्रतिनिधि ग्रह– इष्‍ट देव—- रत्न दान —–सामग्री
गुरु————— विष्‍णु—–पुखराज- —पीली वस्तुएँ
शुक्र————- देवी के रूप— हीरा —–सफेद मिठाई
शनि————- शिव जी—– नीलम —-काली वस्तुएँ
सूर्य——— गायत्री, विष्णु—- माणिक— सफेद वस्तुएँ, नारंगी
बुध————- गणेश——– पन्ना——– हरी वस्तु
मंगल ———हनुमानजी ——मूँगा——- लाल वस्तुएँ
चंद्र————- शिवजी——– मोती——- सफेद वस्तु
विशेष : राहु और केतु पर्वतों के खराब होने पर क्रमश:—
सरस्वती और गणेश जी की आराधना करना लाभ देता है।
‘ऊँ रां राहवे नम:’ और ‘ऊँ कें केतवे नम:’ के जाप से भी ये ग्रह शां‍त होते हैं।

Posted By PT ASHISH TRIPATHIजून 30, 2018

देवताओ का एक दिन

तिथि – चन्द्रमा आकाश में चक्कर लगाता हुआ जिस समय सूर्य के बहुत पास पहुच जाता है उस समय अमावस्या होती है | ( जब चंद्रमा सूर्य और पृथ्वी के बिलकुल मध्य में स्थित होता है तब वह सूर्य के निकटतम होता है |) अमावस्या के बाद चंद्रमा सूर्य से आगे पूर्व की ओर बढ़ता जाता है और जब १२० कला  आगे हो जाता है तब पहली तिथि (प्रथमा) बीतती है | १२० से २४० कला का जब अंतर रहता है तब दूज रहती है | २४० से २६० तक जब चंद्रमा सूर्य से आगे रहता है तब तीज रहती है | इसी प्रकार जब अंतर १६८०-१८O० तक होता है तब पूर्णिमा होती है, १८O०-१९२० तक जब चंद्रमा आगे रहता है तब १६ वी तिथि (प्रतिपदा) होती है | १९२०- २O४० तक दूज होती है इत्यादि | पूर्णिमा के बाद चंद्रमा सूर्यास्त से प्रतिदिन कोई २ घडी (४८ मिनट) पीछे निकालता है |
चन्द्र मासों के नाम इस प्रकार हैं – चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, अश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष या मृगशिरा, पौष, माघ और फाल्गुन |
देवताओं का एक दिन –  मनुष्यों के एक वर्ष को देवताओं के एक दिन माना गया है । उत्तरायण तो उनका दिन है और दक्षिणायन रात्रि । पृथ्वी के उत्तरी ध्रुव पर देवताओं के रहने का स्थान तथा दक्षिणी ध्रुव पर राक्षसों के रहने का स्थान बताया गया है | साल में २ बार दिन और रात सामान होती है | ६ महीने तक सूर्य विषुवत के उत्तर और ६ महीने तक दक्षिण रहता है | पहली छमाही में उत्तरी गोल में दिन बड़ा और रात छोटी तथा दक्षिण गोल में दिन छोटा और रात बड़ी होती है | दूसरी छमाही में ठीक इसका उल्टा होता है | परन्तु जब सूर्य विषुवत वृत्त के उत्तर रहता है तब वह उत्तरी ध्रुव (सुमेरु पर्वत पर) ६ महीने तक सदा दिखाई देता है और दक्षिणी ध्रुव पर इस समय में नहीं दिखाई पड़ता | इसलिए इस छमाही को देवताओ का दिन तथा राक्षसों की रात कहते हैं  | जब सूर्य ६ महीने तक विषुवत वृत्त के दक्षिण रहता है तब उत्तरी ध्रुव पर देवताओं को नहीं दिख पड़ता और राक्षसों को ६ महीने तक दक्षिणी ध्रुव पर बराबर दिखाई पड़ता है | इसलिए हमारे १२ महीने देवताओं अथवा राक्षसों के एक अहोरात्र के समान होते हैं |
देवताओं का १ दिन (दिव्य दिन) = १ सौर वर्ष
दिव्य वर्ष – जैसे ३६० सावन दिनों से एक सावन वर्ष की कल्पना की गयी है उसी प्रकार ३६० दिव्य दिन का एक दिव्य वर्ष माना गया है | यानी ३६० सौर वर्षों का देवताओं का एक वर्ष हुआ | अब आगे बढ़ते हैं |
१२०० दिव्य वर्ष = १ चतुर्युग = १२०० x ३६० = ४३२००० सौर वर्ष
चतुर्युग में सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग होते हैं | चतुर्युग के दसवें भाग का चार गुना सतयुग (४०%), तीन गुना (३०%) त्रेतायुग, दोगुना (२०%) द्वापर युग और एक गुना (१०%) कलियुग होता है |
अर्थात १ चतुर्युग (महायुग) = ४३२०००० सौर वर्ष
१ कलियुग = ४३२००० सौर वर्ष
१ द्वापर युग = ८६४६०० सौर वर्ष
१ त्रेता युग = १२९६००० सौर वर्ष
१ सतयुग = १७२८००० सौर वर्ष
जैसे एक अहोरात्र में प्रातः और सांय दो संध्या होती हैं उसी प्रकार प्रत्येक युग के आदि में जो संध्या होती है उसे आदि संध्या और अंत में जो संध्या आती है उसे संध्यांश कहते हैं | प्रत्येक युग की दोनों संध्याएँ उसके छठे भाग के बराबर होती हैं इसलिए एक संध्या (संधि काल ) बारहवें भाग के सामान हुई | इसका तात्पर्य यह हुआ कि
कलियुग की आदि व अंत संध्या =  ३६०० सौर वर्ष  वर्ष
द्वापर की आदि व् अंत संध्या =  ७२००० सौर वर्ष
त्रेता युग की आदि व अंत संध्या = १०८००० सौर वर्ष
सतयुग की आदि व अंत संध्या = १४४००० सौर वर्ष
अब और आगे बढ़ते हैं |
७१ चतुर्युगों का एक मन्वंतर होता है, जिसके अंत में सतयुग के समान संध्या होती है | इसी संध्या में जलप्लव् होता है | संधि सहित १४ मन्वन्तरों का एक कल्प होता है, जिसके आदि में भी सतयुग के समान एक संध्या होती है, इसलिए एक कल्प में १४ मन्वंतर और १५ सतयुग के सामान संध्या हुई |
अर्थात १ चतुर्युग में २ संध्या
१ मन्वंतर = ७१ x ४३२०००० = ३०६७२०००० सौर वर्ष
मन्वंतर के अंत की संध्या = सतयुग की अवधि = १७२८००० सौर वर्ष
= १४ x ७१ चतुर्युग + १५ सतयुग
= ९९४ चतुर्युग + (१५ x ४)/१० चतुर्युग (चतुर्युग का ४०%)
= १००० चतुर्युग = १००० x १२००० = १२०००००० दिव्य वर्ष
= १००० x ४३२०००० = ४३२००००००० सौर वर्ष
ऐसा मनुस्मृति में भी मिलता है किन्तु आर्यभट की आर्यभटीय के अनुसार
१ कल्प = १४ मनु (मन्वंतर)
१ मनु = ७२ चतुर्युग
और आर्यभट्ट के अनुसार
१४ x ७२ = १००८ चतुर्युग = १ कल्प
जबकि सूर्य सिद्धांत से १००० चतुर्युग = १ कल्प
जो की ब्रह्मा के १ दिन के बराबर है | इतने ही समय की ब्रह्मा की एक रात भी होती है | इस समय ब्रह्मा की आधी आयु बीत चुकी है, शेष आधी आयु का यह पहला कल्प है | इस कल्प के संध्या सहित ६ मनु बीत गए हैं और सातवें मनु वैवस्वत के २७ महायुग बीत गए हैं तथा अट्ठाईसवें महायुग का भी सतयुग बीत चूका है |
इस समय २०१३ में कलियुग के ५०४७ वर्ष बीते हैं |
महायुग से सतयुग के अंत तक का समय = १९७०७८४००० सौर वर्ष
यदि कल्प के आरम्भ से अब तक का समय जानना हो तो ऊपर सतयुग के अंत तक के सौर वर्षों में त्रेता के १२८६००० सौरवर्ष, द्वापर के ८६४००० सौर वर्ष तथा कलियुग के ५०४७ वर्ष और जोड़ देने चाहिए |
बीते हुए ६ मन्वन्तरों के नाम हैं – (१) स्वायम्भुव (२) स्वारोचिष (३) औत्तमी  (४) तामस  (५) रैवत   (६) चाक्षुष | वर्तमान मन्वंतर का नाम वैवस्वत है | वर्तमान कल्प को श्वेत कल्प कहते हैं, इसीलिए हमारे संकल्प में कहते हैं –
प्रवर्तमानस्याद्य ब्राह्मणों द्वितीय प्रहरार्धे श्री श्वेतवराहकल्पे वैवस्वत मन्वन्तरे अष्टाविंशति तमे कलियुगे कलि प्रथम चरणे ……………बौद्धावतारे वर्तमानेस्मिन वर्तमान संवत्सरे अमुकनाम वत्सरे अमुकायने अमुक ऋतु अमुकमासे अमुक पक्षे अमुक तिथौ अमुकवासरे अमुकनक्षत्रे संयुक्त चन्द्रे …. ….. तिथौ ………
एक सौर वर्ष में १२ सौर मास तथा ३६५.२५८५ मध्यम सावन दिन होते हैं परन्तु १२ चंद्रमास ३५४.३६७०५ मध्यम सावन दिन का होता है, इसलिए १२ चंद्रमासों का एक वर्ष सौर वर्ष से १०.८९१७० मध्यम सावन दिन छोटा होता है | इसलिए कोई तैंतीस महीने में ये अंतर एक चंद्रमास के समान हो जाता है | जिस सौर वर्ष में यह अंतर १ चंद्रमास के समान हो जाता है उस सौर वर्ष में १३ चंद्रमास होते हैं | उस मास को अर्धमास या मलमास कहा जाता है | यदि ऐसा न किया जाये तो चंद्रमास के अनुसार मनाये जाने वाले त्यौहार पर्व इत्यादि भिन्न भिन्न ऋतुओं में मुसलमानी त्यौहारों की तरह भिन्न भिन्न ऋतुओं में पड़ने लगे |
किस घंटे (होरा) का स्वामी कौन ग्रह है यह जानने के लिए वह क्रम समझ लेना चाहिए जिस क्रम से घंटे के स्वामी बदलते हैं | शनि ग्रह पृथ्वी से सब ग्रहों से दूर है, उस से निकटवर्ती बृहस्पति है, बृहस्पति से निकट मंगल, मंगल से निकट सूर्य, सूर्य से निकट शुक्र, शुक्र से निकट बुध और बुध से निकट चंद्रमा है | इसी क्रम से होरा के स्वामी बदलते हैं | यदि पहले घंटे का स्वामी शनि है तो दूसरे घंटे का स्वामी बृहस्पति, तीसरे घंटे का स्वामी मंगल, चौथे का सूर्य, पांचवे का शुक्र, छठे का बुध, सातवें का चन्द्रमा, आठवें का फिर शनि इत्यादि क्रमानुसार हैं | परन्तु जिस दिन दिन पहले घंटे का स्वामी शनि होता है उस दिन का नाम शनिवार होना चाहिए | इसलिए शनिवार के दूसरे घंटे का स्वामी बृहस्पति, तीसरे घंटे का स्वामी मंगल इत्यादि हैं | इस प्रकार सात सात घंटे के बाद स्वामियों का वही क्रम फिर आरम्भ होता है | इसलिए शनिवार के २२वें घंटे का स्वामी शनि, २३वें का बृहस्पति, २४वें का मंगल और २४वें के बाद वाले घंटे का स्वामी सूर्य होना चाहिए | परन्तु यहाँ २५वां घंटा अगले दिन का पहला घंटा है जिसका स्वामी सूर्य है इसलिए शनिवार के बाद रविवार आता है | इसी प्रकार रविवार के २५वें घंटे यानी अगले दिन के पहले घंटे का स्वामी चन्द्रमा होगा इसलिए उसे चंद्रवार या सोमवार कहते हैं | इसी प्रकार और वारों का नामकरण हुआ है |
इससे यह स्पष्ट होता है कि शनिवार के बाद रविवार और रविवार के बाद सोमवार और सोमवार के बाद मंगलवार क्यों होता है | शनि से रवि चौथा ग्रह है और रवि से चौथा ग्रह है और रवि से चंद्रमा चौथा ग्रह है अतः प्रत्येक दिन का स्वामी उसके पिछले दिन के स्वामी से चौथा ग्रह है |
मैटोनिक चक्र – मिटन ने ४३३ ई.पू. में देखा कि २३५ चंद्रमास और १९ सौर वर्ष अर्थात १९x१२ = २२८ सौर मासों में समय लगभग समान होता है, इनमें लगभग १ घंटे का अंतर होता है |
१९ सौर वर्ष = १९ x ३६५.२५ = ६९३९.७५ दिवस
२३५ चन्द्र मास = २३५x२९.५३१ = ६९३९.७८५ दिवस
इस प्रकार हम देखते हैं कि प्रत्येक १९ वर्ष में २२८ सौर मास और लगभग २३५ चन्द्र मास होते हैं अर्थात ७ चन्द्र मास अधिक होते हैं | चन्द्र और सौर वर्षों का अगर समन्वय नहीं करे तब लगभग ३२.५ सौर वर्षों में, ३३.५ चन्द्र वर्ष हो जायेंगे | अगर केवल चन्द्र वर्ष से ही चलें तब अगर दीपावली नवम्बर में आती है तब १९ वर्षों में यह ७ मास पहले अर्थात अप्रेल में आ जाएगी और इन धार्मिक त्यौहारों का ऋतुओं से कोई सम्बन्ध नहीं रह जायेगा | इसलिये भारतीय पंचांग में इसका ख्याल रखा जाता है |
क्षयमास – मलमास या अधिमास की भांति क्षयमास भी होता है | सूर्य की कोणीय गति नवम्बर से फरवरी तक तीव्र हो जाती है और इसकी इसकी संक्रांतियों के मध्य समय का अंतर कम हो जाता है | इन मासों में कभी कभी जब संक्रांति से कुछ मिनट पहले ही अमावस्या का अंत हुआ हो, तब मास का क्षय हो जाता है |
जिस चंद्रमास (एक अमावस्या के अंत से दूसरी अमावस्या के अंत तक) में दो संक्रांतियों आ जाएँ, उसमें एक मास का क्षय हो जाता है | यह कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष और माघ इन चार मास में ही होता है अर्थात नवम्बर से फरवरी तक ही हो सकता है |
अब संक्षिप्त में राशियों  और नक्षत्रों के बारे में चर्चा करते हैं ताकि आगे जब ग्रहों और नक्षत्रों के बारे में कोई सन्दर्भ आये तो हमें उसमें कोई उलझन न हो |

Posted By PT ASHISH TRIPATHIजून 30, 2018

राशिचक्र

राशिचक्र – सूर्य जिस मार्ग से चलता हुआ आकाश में प्रतीत होता है उसे कान्तिवृत्त कहते हैं | अगर इस कान्तिवृत्त को बारह भागों में बांटा जाये तो हर एक भाग को राशि कहते हैं अतः ऐसा वृत्त जिस पर नौ ग्रह घूमते हुए प्रतीत होते हैं (ज्योतिष में सूर्य को भी ग्रह ही माना गया है ) राशीचक्र कहलाता है | इसे हम ऐसे भी कह सकते हैं की पृथ्वी के पूरे गोल परिपथ को बारह भागों में विभाजित कर उन भागों में पड़ने वाले आकाशीय पिंडों के प्रभाव के आधार पर पृथ्वी के मार्ग में बारह किमी के पत्थर काल्पनिक रूप से माने गए हैं |
अब हम जानते हैं की एक वृत्त ३६० अंश में बांटा जाता है | इसलिए एक राशी जो राशिचक्र का बारहवां भाग है, ३० अंशों की हुई | यानी एक राशि ३० अंशो की होती है | राशियों का नाम उनकी अंशो सहित इस प्रकार है |
अंशराशी
०-३०मेष
३०-६०वृष
६०-९०मिथुन
९०-१२०कर्क
१२०-१५०सिंह
१५०-१८०कन्या
१८०-२१०तुला
२१०-२४०वृश्चिक
२४०-२७०धनु
२७०-३००मकर
३००-३३०कुम्भ
३३०-३६०मीन
चित्र १
नक्षत्र – आकाश में तारों के समुदाय को नक्षत्र कहते हैं | आकाश मंडल में जो असंख्य तारिकाओं से कही अश्व, शकट, सर्प, हाथ आदि के आकार बन जाते हैं, वे ही नक्षत्र कहलाते हैं | (जिस प्रकार पृथ्वी पर एक स्थान से दूसरे स्थान की दूरी मीलों में या कोसों में नापी जाती है उसी प्रकार आकाश मंडल की दूरी नक्षत्रों में नापी जाती है |) राशि चक्र ( वह वृत्त जिस पर ९ ग्रह घूमते हुए प्रतीत होते हैं | ) को २७ भागों में विभाजित करने पर २७ नक्षत्र बनते हैं |
पृथ्वी के कुल ३६० कला के परिपथ को नक्षत्रों  के लिए २७ भागों में बांटा गया है ( जैसे राशियों के लिए १२ भागों में बांटा गया है |) अतः प्रत्येक नक्षत्र ३६०/२७ = १३ मिनट २० सेकंड = ८०० अंश  का होगा | इसके उपरान्त भी नक्षत्रों को चार चरणों में बांटा गया है | प्रत्येक चरण १३ मिनट २० सेकंड/ ४ = ३ मिनट २० सेकंड = २०० अंश  का होगा | क्योंकि एक राशि ३० अंश की होती है अतः हम कह सकते हैं कि सवा दो नक्षत्र अर्थात ९ चरण अर्थात ३० अंश की एक राशि होती है |
नक्षत्रों के नाम –
१. अश्विनी                २. भरिणी                   ३. कृत्तिका                          ४. रोहिणी
५. मृगशिरा                ६. आर्द्रा                      ७. पुनर्वसु                            ८. पुष्य
९. आश्लेषा                १०. मेघा                     ११. पूर्वा फाल्गुनी                १२. उत्तरा फाल्गुनी
१३. हस्त                    १४. चित्रा                    १५. स्वाति                           १६. विशाखा
१७. अनुराधा               १८. ज्येष्ठा                १९. मूल                                २०. पूवाषाढा
२१. उत्तराषाढा            २२. श्रवण                  २३. धनिष्ठा                         २४. शतभिषा
२५. पूर्वाभाद्रपद            २६. रेवती
अभिजीत को २८वां नक्षत्र माना गया है | उत्तराषाढ़ की आखिरी १५ घाटियाँ और श्रवण की प्रारंभ की ४ घाटियाँ, इस प्रकार १९ घटियों के मान वाला अभिजीत नक्षत्र होता है | यह समस्त कार्यों में शुभ माना जाता है |
सूक्ष्मता से समझाने के  नक्षत्र के भी ४ भाग किये गए हैं, जो चरण कहलाते हैं | प्रत्येक नक्षत्र का एक स्वामी होता है |
अश्विनी – अश्विनी कुमार                              भरणी – काल                          कृत्तिका – अग्नि
रोहिणी – ब्रह्मा                                              मृगशिरा – चन्द्रमा                   आर्द्रा – रूद्र
पुनर्वसु – अदिति                                            पुष्य – बृहस्पति                      आश्लेषा – सर्प
मघा – पितर                                                   पूर्व फाल्गुनी – भग                 उत्तराफाल्गुनी – अर्यता
हस्त – सूर्य                                                    चित्रा – विश्वकर्मा                    स्वाति – पवन
विशाखा – शुक्राग्नि                                       अनुराधा – मित्र                        ज्येष्ठा – इंद्र
मूल – निऋति                                                पूर्वाषाढ़ – जल                         उत्तराषाढ़ – विश्वेदेव
श्रवण – विष्णु                                                धनिष्ठा – वसु                         शतभिषा – वरुण
पूर्वाभाद्रपद – आजैकपाद                                उत्तराभाद्रपद – अहिर्बुधन्य     रेवती – पूषा
अभिजीत – ब्रह्मा


नक्षत्रों के फलादेश भी स्वामियों के स्वभाव गुण के अनुसार जानना चाहिए |

Posted By PT ASHISH TRIPATHIजून 30, 2018

सौर मंडल में ९ ग्रहों का महत्व

सौर मंडल – सौर मंडल में ९ ग्रहों में अरूण ग्रह (यूरेनस), वरुण ग्रह (नेपच्यून) और यम (प्लूटो) को प्राचीन ज्योतिष में नहीं गिना गया है (ऐसा माना गया है कि इनसे आती हुई किरणें मनुष्य जीवन को बहुत प्रभावित नहीं करते या इनका प्रभाव नगण्य है | ) चंद्रमा और दो छाया ग्रह जिन्हें राहु, केतु माना गया है | राहु और केतु वास्तव में कोई वास्तविक ग्रह नहीं है बल्कि गणितीय गणनाओं से आई सूर्य और चंद्रमा कि कक्षाओं के मिलान बिंदु हैं |
शुक्र और बुध, पृथ्वी और सूर्य के मध्य आते हैं अतः इन्हें “आतंरिक ग्रह” (Inner Planets or Inferior Plantes) कहा जाता है |
मंगल, गुरु और शनि पृथ्वी की कक्षाओं से बाहर की तरफ आकाश में स्थित हैं अतः इन्हें “बाहरी ग्रह”(Outer Palnets or Superior Planets) कहते हैं |
पृथ्वी अपने अक्ष पर और सूर्य के चारों ओर लगातार घूमती है | इसकी गति ३० किमी/सेकंड या १६०० किमी/मिनट या ९६६०००००० किमी/वर्ष है |
पृथ्वी अपने अक्ष से २३.५ झुकी हुई है | धरती अपने अक्ष पर इस प्रकार झुकी हुई है जिससे कि इसका उत्तरी सिरा हमेशा उत्तरी ध्रुव तारे के सामने रहता है | जहाँ पर पृथ्वी के अक्ष के उत्तरी और दक्षिणी सिरे पृथ्वी की सतह पर मिलते हैं, उनको ही उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव कहा जाता है |
Chitra 1चित्र – १
भूमध्य रेखा – यदि पृथ्वी के मध्य से जाता हुआ यदि एक Plan खींचे जो पृथ्वी के अक्ष से लम्बवत (Perpendicular) हो तो वो पृथ्वी की सतह को जब काटेगा तो वह एक वृत्त होगा, जिसे पृथ्वी कि भूमध्य रेखा कहते हैं |
चित्र २ चित्र – २
उत्तरी गोलार्ध एवं दक्षिणी गोलार्ध – उस plan के उत्तरी भाग को उत्तरी गोलार्ध व दक्षिणी भाग को दक्षिणी गोलार्ध कहते हैं |
रेखांश (Longitudes) एवं अक्षांश (Latitude) – पृथ्वी की सतह को सामान भागों में Vertical एवं Horizontal भागों में बांटने को रेखांश व् अक्षांश कहते हैं | अक्षांश (अक्ष का अंश) horizontal lines एवं रेखांश Vertical lines को कहते हैं | इसे आप पृथ्वी के co-ordinates भी कह सकते हैं |
३६० अक्षांश एवं ३६० रेखांश मिला कर १० का एक Post बनाते हैं जो पूरा वर्ग (square) नहीं होता क्योंकि पृथ्वी पूरी गोल नहीं है | पृथ्वी कि परिधि ४०३४३ किमी है अतः १० का वर्ग ११० किमीx११० किमी या ६९ milesx६९ miles का होता है और उस भाग में जो शहर आते हैं उन्हें उसके रेखांश और अक्षांश से ही निकालते हैं और ये रेखांश या अक्षांश एक दूसरे से पूरी तरह सामानांतर (parallal) नहीं होती क्योंकि पृथ्वी कि भौगोलिक रचना ऐसी नहीं है | रेखांश को देशांतर भी कहते हैं |
२३.५ अंश उत्तरी अक्षांश रेखा को कर्क रेखा तथा २३.५ अंश दक्षिणी अक्षांश रेखा को मकर रेखा कहते हैं |
चित्र ३  चित्र – ३
चित्र ४ चित्र – ४
 चित्र ५चित्र ६
चित्र – ५                                                                                 चित्र – ६
मानक मध्यान्ह रेखा या मुख्य मध्यान्ह रेखा (Standard Meridian) – प्रत्येक देश का फैलाव उत्तर व् दक्षिण की ओर ही नहीं होता बल्कि पूर्व और पश्चिम में भी होता हो | जो देश पूर्व में होंगे वहां मध्यान्ह पहले होगा बजाय उनके जो पश्चिम में होंगे | इस कारण पूर्व वाले स्थानों का स्थानीय समय पश्चिम वाले स्थानो से अधिक होगा | इससे समस्या यह आती है कि पूर्व वाला समय कुछ बताएगा और पश्चिम वाला कुछ और बताएगा | सांसारिक व्यवहार गड़बड़ा जायेगा | इस का हल यह निकाला गया कि एक देश और अधिक विस्तार वाले देशों को क्षेत्रों में बांटकर एक क्षेत्र की एक मुख मध्यान्ह रेखा/मानक मध्यान्ह रेखा हो और उस स्थान का स्थानीय समय उस सारे देश या क्षेत्र में मान्य हो अर्थात उस समयानुसार ही उस देश या क्षेत्र के सारे सांसारिक कार्य संपन्न किये जायेंगे |
 चित्र ७चित्र – ७
 चित्र ८चित्र – ८
प्रधान मध्यान्ह रेखा या प्रथम मध्यान्ह रेखा (Prime Meridian) – सारी रेखांश को मापने के लिए एक मध्य रेखांश चुना गया है जो ग्रीनविच से होते हुए जाता है | उसे 0E या 0 रेखांश माना जाता है और बाकी सारे उसके सन्दर्भ में गिनते हैं पूर्व की ओर या पश्चिम कि ओर | भारत में ८२.५ अंश पूर्वी रेखांश = ८२३०’ के आधार पर मानक समय प्रामाणित है |
अब हमें समझना चाहिए कि सूर्य सर्वप्रथम १८० अंश पूर्वी रेखांश पर निकालता है और धीरे धीरे ० अंश रेखांश ग्रीनविच को पार करता हुआ १८० अंश पश्चिमी रेखांश पर पहुँच कर छिपता हुआ दृष्टिगोचर होता है | इस यात्रा में इसे २४ घंटे लगते हैं अर्थात सूर्य १८० अंश पूर्वी + १८० अंश पश्चिमी = ३६० रेखांशों को २४ घंटे में पार करता है | इस प्रकार १ रेखांश पार करने में २४ घंटे x ६० मिनट = १४४० मिनट लगते हैं यानी १ पार करने में १४४०/३६० = ४ मिनट लगते हैं | यही कारण है कि १८० पूर्वी रेखांश के नजदीक जापान में जब सोमवार होता है तो १८० पश्चिमी रेखांश के नजदीक होनोलुलु में रविवार का दिन होता है | ऐसी स्थिति में विश्व के किसी भी स्थान/रेखांश पर खड़े होकर सूर्य कि स्थिति जान सकते हैं | सूर्योदय और दोपहर अर्धरात्रि अमुक समय किस स्थान पर होगी, स्पष्ट रूप से बता सकते हैं |
चित्र ९चित्र – ९
अब ऊपर की दोनों बातों को ध्यान में रख कर हम समय गणना को समझने का प्रयास करेंगे | ऊपर कि बातों से ये स्पष्ट है कि दो भिन्न भिन्न स्थानों के स्थानीय समयों में अंतर अवश्य आएगा जैसे दिल्ली और कोलकाता के स्थानीय समय में ४४’३८’’ का अंतर है अर्थात जब कोलकाता में २ बजकर ४४’३८’’ होंगे तब दिल्ली में २ बजे होंगे |
किसी स्थान का किसी समय पर औसत समय ज्ञात करने के लिए (१) उस स्थान का देशांतर (रेखांश/Longitude) (२) उस क्षेत्र/देश, जिसमें वह स्थान है, वहां का मानक समय (IST, भारत के सन्दर्भ में) (३) उस देश/क्षेत्र की मानक मध्यान्ह रेखा का देशांतर मालूम होना चाहिए | इसके बाद निम्न प्रक्रिया  से स्थानीय समय ज्ञात किया जा सकता है |
प्रथम चरण – स्थानीय देशांतर और देश/क्षेत्र कि मानक मध्यान्ह रेखा के देशांतर का अंतर ज्ञात कर लें |
दूसरा चरण – इस अंतर को ४ मिनट प्रति अंश के अनुसार गुना करें | (पृथ्वी ३६० २४ घंटे में घूमती है अर्थात १५ = १ घंटा या १ = ४ मिनट) अंश को ४ से गुना करने से मिनट व् कला को ४ से गुना करने पर सेकंड्स में समय का अंतर आ जायेगा |
तीसरा चरण – अगर वह स्थान मानक रेखा के पूर्व में हो तो दूसरे चरण वाला समय, मानक समय में जोड़ देंगे और पश्चिम में हो तो घटा देंगे | ऐसा करने पर स्थानीय समय आ जायेगा |
उदाहरण – भुवनेश्वर (उड़ीसा) में सांय ६ बज कर २५ मिनट भारतीय मानक समय पर वहां स्थानीय समय क्या था ? भुवनेश्वर का देशांतर ८५ ५०’ पूर्व है |
विधि (i) – भुवनेश्वर का देशांतर =  ८५ ५०’ पूर्व
मानक रेखा का देशांतर =  ८२३०’ पूर्व
दोनों का अंतर = ३ डिग्री २० मिनट = ३२०’
इसे ४ से गुणा करने पर ३२०’ x ४ = १२ मिनट ८० सेकंड्स = १३ मिनट २० सेकंड्स
क्योंकि यह मानक रेखा के पूर्व में है इसलिए इसका स्थानीय समय अधिक होगा |
अतः स्थानीय समय = ६:२५:० + ०:१३:२० = ६:३८:२० सांय
विधि (ii)  – यही काम लहरी कि लग्न सारिणी ने और आसान कर दिया | लाहिरी कि लग्न सारिणी में पृष्ठ १०१ पर यहाँ के लिए स्थानीय संस्कार के Coulmn में +१३ मिनट २० सेकंड दिया है |
इसे हम सीधा स्थानीय समय में परिवर्तित कर सकते हैं –
घटना का स्थानीय समय = भारतीय मानक समय + संस्कार
= ६:२५:० + ०:१३:२० = ६:३८:२० सांय
जो विधि (i) से मिलता है |
उदहारण २ : चेन्नई में ९ बजकर ३५ मिनट भारतीय मानक समय का स्थानीय समय क्या होगा ? चेन्नई का देशांतर ८०१५’ पूर्व है |
(अ)       देशान्तरों का अंतर ८२३०’ – ८०१५’ = २१५’
(आ)                       २१५’ x ४ = ८ मिनट ६० सेकंड्स = ९ मिनट
(इ)   चेन्नई का देशांतर मानक देशांतर (पूर्व) से कम है इस कारण चेन्नई मानक देशांतर वाले स्थान से पश्चिम में हुई | इसलिए ९ मिनट घटाएंगे | चेन्नई की घटना के समय स्थानीय समय ९ घंटा ३५ मिनट – ९ मिनट = ९ घंटा २६ मिनट प्रातः
अब इसे हमें याद रखना होगा, आगे जाकर यह जन्म समय निकालने में काम आएगा | तब हम विदेशों के स्थानीय समय निकालना भी सीखेंगे |
आकाशीय गोल या खगोल (celestial Sphere) – जिस प्रकार हम किसी गोल गुब्बारे को फुलाते हैं तो वह छोटे से बड़ा फिर और बड़ा हो जाता है, उसी प्रकार पृथ्वी को अनन्त आकाश में फैलाने पर जो गोला बनेगा उसे आकाशीय गोला या खगोल कहते हैं | इस खगोल का केंद्र पृथ्वी का केंद्र होगा |
कान्तिवृत्त (Ecliptic) – सूर्य के तारों के बीच एक वर्ष के आभासीय भ्रमण मार्ग को इसकी कक्षा कहते हैं | जब इस कक्षा को खगोल में फैलाया जावे तो खगोल के ताल पर एक बड़ा वृत्त बनता है उसे कान्तिवृत्त कहते हैं | मॉडर्न science में पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करता है न कि सूर्य पृथ्वी की (इसको टाल्मी ने माना कि जिसे हम सूर्य का आभासीय भ्रमण कहते हैं वह पृथ्वी का भी आभासीय भ्रमण हो सकता है किन्तु यहाँ हम Modern Science को ही प्रमाण मानेगे ) इस कारण क्रांतिवृत्त की परिभाषा यह भी होती है कि पृथ्वी के वार्षिक भ्रमण मार्ग को अनन्त आकाश में फैलाने पर जिन स्थानों पर वह खगोल को काटे उस वृत्त को कान्तिवृत्त कहते हैं | यह कान्तिवृत्त विषुववृत्त (celestial Equator) पर २३२७’ का कोण बनाता है |
चित्र १०चित्र – १०
भचक्र या राशिचक्र – कान्तिवृत्त के दोनों ओर उत्तर और दक्षिण में ९ की पट्टी को भचक्र कहते हैं | इसमें वृत्त पर कान्तिवृत्त के ९ उत्तर में और व् ल कान्तिवृत्त के ९० दक्षिण में है | इसी पट्टी में चंद्रमा व् सारे ग्रह भ्रमण करते हैं | मैंने बहुत प्रयास किया किन्तु इसका चित्र में नहीं बना पा रहा हूँ, सिर्फ समझने भर के लिए मैंने ऊपर वाले चित्र को थोडा बदला है |
चित्र ११ चित्र – ११
भोगांश (celestial Longitude) – कान्तिवृत्त के ध्रुवों को कदम्ब कहते हैं |  कदम्बों को मिलाने वाले बड़े वृत्त कान्तिवृत्त को लम्बवत काटते हैं | आकृति १२ में प और फ कदम्ब हैं | आकाशीय पिंड की कान्तिवृत्त पर मेष के प्रथम बिंदु से कोणीय दूरी को भोगांश कहते हैं | इसे इस प्रकार समझे कि आकाशीय पिंड से कान्तिवृत्त के तल पर खगोल कि सतह के साथ लम्बवत चाप डालें और जिस स्थान पर वह कान्तिवृत्त को काटे, उस स्थान की मेष के प्रथम बिंदु से कोणीय दूरी भोगांश होती है |
चित्र १२
चित्र १२
विक्षेप या शर (celestial Latitude) – आकाशीय पिंड से कान्तिवृत्त पर लम्बवत चाप की कोणीय दूरी को विक्षेप (शर) कहते हैं |
विशुवांश – आकाशीय पिंड से विषुवत वृत्त पर लम्बवत चाप जहाँ मिले, उस बिंदु की सायन मेष का प्रथम बिंदु से कोणीय दूरी को विशुवांश कहते हैं | यह विषुवत वृत्त का भाग या अंश होने से विशुवांश कहलाता है |
क्रान्ति (Declination) – आकाशीय पिंड से विषुवत वृत्त पर लम्बवत चाप जो कोण पृथ्वी के केंद्र (या खगोल के केंद्र) पर बनावे, वह कोण क्रांति होती है अर्थात आकाशीय पिंड की विषुवत वृत्त से लम्बवत कोणीय दूरी को क्रांति कहते हैं |
ऊपर कि आकृति में अ ब विषुवत वृत्त हैं |
क ख कान्तिवृत्त है |
म और त मेष व् तुला राशि के प्रथम बिंदु हैं | आ एक आकाशीय पिंड है |
उ और द विषुवत वृत्त के ध्रुव हैं | प और फ कान्तिवृत्त के ध्रुव हैं | उ आ च विषुवत वृत्त पर लम्बवत चाप है | प आ छ कान्तिवृत्त पर लम्बवत चाप है |
म छ चाप का कोण इस आकाशीय पिंड का भोगांश है |
आ छ चाप का कोण इसका विक्षेप है |
म च चाप का कोण इसका विशुवांश है |
ऊ च चाप का कोण इसकी क्रांति है |
क्षितिज वृत्त (Horizon) – दृष्टा या देखने वाला या प्रेक्षक को जहाँ पृथ्वी और आकाश मिलते हुए दिखाई देते हैं, उसे अनन्त आकाश में फैलाने पर जहाँ वह खगोल या आकाशीय गोले को मिले, वह वृत्त क्षितिज वृत्त कहलाता है |
शिरोबिंदु (Zenith) – प्रेक्षक जहाँ खड़ा हो उसके ठीक सिर के ऊपर जो रेखा पृथ्वी के केंद्र से सिर से होती हुई खगोल को मिले वह बिंदु शिरोबिंदु कहलाता है | यह क्षितिज वृत्त का एक ध्रुव है | यह बिंदु सिर के ऊपर होता है |
अधोबिंदु या पाताल (Nadir) – प्रेक्षक जिस स्थान पर खड़ा हो तब उसके पैरों से और पृथ्वी के केंद्र से होती हुई रेखा खगोल को जिस स्थान पर काटे, वह बिंदु अधोबिंदु कहलाता है | यह ठीक पैर के नीचे होता है | यह क्षितिज वृत्त का दूसरा ध्रुव है |
उद्वृत्त (Vertical) – किसी स्थान के शिरोबिंदु और अधोबिंदु को आकाशीय गोले के ताल पर मिलाने से जो बड़े वृत्त बनते हैं, उन्हें उद्वृत्त कहते हैं | यह क्षितिज वृत्त पर लम्बवत होते हैं |
याम्योत्तर वृत्त (celestial Meridian) – आकाशीय ध्रुवों और प्रेक्षक के शिरोबिंदु से जो वृत्त खगोल पर बनता है, उसे दर्शक का याम्योत्तर वृत्त कहते हैं | यह क्षितिज वृत्त को उत्तर व् दक्षिण बिन्दुओं को लम्बवत काटता है | दक्षिण को यम भी कहते हैं | इस प्रकार जो वृत्त किसी स्थान के दक्षिण से उत्तर तक शिरोबिंदु से होता हुआ जाए वह याम्योत्तर वृत्त हुआ |
उन्नतांश (Altitude) – किसी आकाशीय पिंड की प्रेक्षक के क्षितिज वृत्त से लम्बवत कोणीय ऊंचाई को उन्नतांश कहते हैं अर्थात दर्शक को वह पिंड किस कोण की ऊंचाई पर दिखाई दे रहा है | जिस उद्वृत्त पर वह पिंड है, उस उद्वृत्त को चाप का कोण जो वह पिंड से क्षितिज वृत्त तक बना रही है उसे उन्नतांश कहते हैं |
होरा कोण – पृथ्वी ३६० में अपना एक चक्कर लगाती है अर्थात ३६० =२४ घंटे या १५ = १ घंटा | इस प्रकार हम कह सकते हैं सूर्य १ घंटे में १५ घूमता हैं और कहें तो ४ मिनट में सूर्य १ घूमता है | इस प्रकार सूर्य के अंशों को घंटे में बदलने पर समय का माप आ जाता है | इसलिए यह सूर्य का समय कोण या होरा कोण कहलाता है |
नक्षत्र काल या सम्पात काल (Sidereal Period) – ग्रह या आकाशीय पिंड एक स्थिर तारे के सामने से चलकर पुनः उसी तारे के सामने आने में जितना समय लेता है वह उसका नक्षत्र काल कहलाता है |
युति (Conjunction) – बाह्य ग्रहों और पृथ्वी के मध्य सूर्य हो और ग्रह व् सूर्य दोनों के अंश सामान हों तब ग्रह की युति होती है |
अंतर्युती या निकृष्ट युति (inferior Conjunction) – जब कोई आतंरिक ग्रह (बुध और शुक्र) सूर्य और पृथ्वी के मध्य में हो अर्थात ग्रह के एक ओर सूर्य और दूसरी ओर पृथ्वी हो और सूर्य व् ग्रह दोनों के अंश सामान हों वह उस ग्रह की अंतर्युती होती है |
बहिर्युती (Superior Conjunction) – जब आतंरिक ग्रह और सूर्य दोनों के अंश सामान हों और ग्रह व पृथ्वी के मध्य सूर्य हो तब वह उस ग्रह की बहिर्युती होती है |
चित्र १३
चित्र – १३
विपरीत युति – युति और विपरीत युति बाह्य ग्रहों की ही होती है | इस समय सूर्य और ग्रह के अंशों का अंतर १८० (६ राशि) होता है अर्थात बाह्य ग्रह और सूर्य के मध्य पृथ्वी होती है |
संयुति काल – कोई ग्रह एक प्रकार की युति से चक्कर (अंतर्युती, बहिर्युती या विपरीत युति) पुनः उसी प्रकार की युति तक आने में जितना समय लेता है वह उस ग्रह का संयुति काल कहलाता है |
अब हम फिर से उस श्लोक की चर्चा करेंगे जहाँ से हमने ये अध्याय प्रारंभ किया था |
योजनानि शतान्यष्टो भूकर्णों द्विगुणानि तु |
तद्वर्गतो दशगुणात्पदे भूपरिधिर्भवते ||
अर्थात पृथ्वी का व्यास ८०० के दूने १६०० योजन है, इसके वर्ग का १० गुना करके गुणनफल का वर्गमूल निकालने से जो आता है, वह पृथ्वी कि परिधि है |
यदि पृथ्वी का व्यास ‘व’ मान लिया जाए तो इसकी परिधि = √वx१० = व√१० = वx३.१६२३, जिससे सिद्ध होता है कि परिधि व्यास का ३.१६२३ गुना होती है | आज कल यह सम्बन्ध ३.१४१६ दशमलव के चार स्थानों तक शुद्ध समझा जाता है जो ३.१६२३ से बहुत भिन्न है परन्तु इस से ये नहीं समझना चाहिए कि सूर्यसिद्धांतकार को व्यास और परिधि का ठीक ठीक सम्बन्ध नहीं मालूम था; क्योंकि दूसरे अध्याय में (सूर्य सिद्धांत के) अर्धव्यास और परिधि के अनुपात ३४३८:२१६०० माना गया है जिससे परिधि व्यास का ३.१४१३६ गुना ठहरती है | इसलिए इस श्लोक में परिधि को व्यास का √१०, सुविधा के लिए, गणित की क्रिया को संक्षेप करने के लिए माना गया है | जैसे आज कल जब स्थूल रीति से काम लेना होता है तो कोई इसको २२/७ और कोई इसे ३.१४ मानते हैं और जहाँ बहुत सूक्ष्म गणना करने कि आवश्यकता होती है वहां इसको दशमलव के पांच पांच, सात सात स्थानों तक शुद्ध करना पड़ता है |
अब प्रश्न यह रह गया कि भूपरिधि नापी कैसे गयी ? भास्कराचार्य गोलाध्याय भुवनकोष के १३ वें पृष्ठ के १४ वें श्लोक में बताते हैं कि उत्तर दक्षिण रेखा पर स्थित दो स्थानों की दूरी योजनो में नाप लो | उन दो स्थानों के अक्षांशो का भी अंतर निकाल लो | फिर त्रैराशिक द्वारा यह जान लेना चाहिए कि जब इतने अक्षांशो में अंतर होने से दो स्थानों कि दूरी इतने योजन होती है तब ३६० पर क्या होगी |
इसकी उपपत्ति इस प्रकार है –
चित्र १४चित्र – १४
भ – पृथ्वी का केंद्र                   वभ – विषुवतीय त्रिज्या
उ – उत्तरी ध्रुव या सुमेरू
स, सा – एक ही उत्तर दक्षिण रेखा (Meridian) के दो स्थान
स का अक्षांश = ∆ वभस                सा का अक्षांश = ∆ वभसा
दोनों के अक्षांशों का अंतर = ∆ सभसा
फिर अनुपात निकालें तो
∆ सभसा : ३६० :: ससा : भूपरिधि
अतः भूपरिधि = (३६० x ससा)/ ∆सभसा
भूपरिधि इसी रीति से आज भी निकाली जाती है; केवल सूक्ष्म यंत्रों के कारण अब अधिक शुद्धता पूर्वक यह काम किया जाता है |
अब पृथ्वी कि परिकल्पना के लिए हमारे सिद्धांतों में ऐसा वृत्त लिया गया है, जिसकी त्रिज्या ३४३८ इकाइयाँ और परिधि २१६०० इकाइयाँ होती है जिसमें १-१ इकाई एक एक कला के बराबर होती है | क्योंकि परिधि एक चक्र के सामान होती है जिसमें ३६० अथवा ३६०x६० = २१६०० कलाएं होती है | त्रिज्या का मान ३४३८ इसलिए लिया गया है कि जब परिधि कलाओं में विभाजित की जाती है तब त्रिज्या का मान ३४३७(३/४) कला आज कल कि सूक्ष्म गणना से ठहरता है जिसका निकटतम पूर्णांक ३४३८ है | आजकल के १ रेडियन में जितनी कलाएं होती है उतनी ही पूर्ण कलाओं के सामान त्रिज्या का परिमाण माना गया है |
१ रेडियन = ५७.२९५८ = ३४६७.७४८ कला

Posted By PT ASHISH TRIPATHIजून 30, 2018