पंडित आशीष त्रिपाठी
आज लगता है कुछ छूट सा गया
बचपन का दिल टूट सा गया है
बाते करते थे जो खिलौने बचपन मे
आज वो पता नही क्यों रूठ गया है।
खेलता था जिन दीवारों पर लकीरे बना कर
आज पता नही क्यों वो दीवारे भूल सी गई है
माता पिता का साथ था तो दिल में जज्बात थे
आज पता नही क्यों दिल टूट सा गया और साथ छूट से गया है
बचपन की वो गलतिया माफ़ी के काबिल होती थी
जिन गलतियों पर आज हम बेबस से है
आज फिर कोई छूट सा गया है
एक रिश्ता और टूट सा गया है ।









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