शनिवार, 30 जून 2018

ऐ इंसान अब बस करो इंसानियत के रास्ते बंद मत करो।

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ऐ इंसान अब बस करो इंसानियत के रास्ते बंद मत करो ।
ये मन कचोटता सा हैं जैसे दिल पर कोई चाकू खरोचता है ।
कभी छोटी तो कभी बड़ी कभी अपने तो कभी पराये ।
इन पर सब क्यों है गंदी नज़र गड़ाए।
न्याय की भीड़ मे जो खड़े दिन में होते है
रात के अंधेरे में वही असली दरिंदे होते है 
क्या छोटी की बच्ची के साथ तुम्हे खेलना अच्छा लगता है
उनके सपनो को यो कुचलना तुम्हे अच्छा लगता है
तुम शैतान हो असल मे तुम लगते नही
लेकिन तुम इंसान हो ऐसे भी तुम लगते नही।
बचपन मे तुम कौन सा खेल खेलते थे तुम्हे याद है
तुम्हारी माँ ने कौन सा सबक   सिखाया तुम्हे याद है।
माँ के दूध न पिता की परवरिश की तुम्हे चिंता थी
तुम्हे तो बस इन मासूमो के सपनो की चिता जलानी थी।
ऐ इंसान अब बस करो इंसानियत के रास्ते बंद मत करो।

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